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संकल्प की शक्ति एक बार एक गुरु अपने कुछ शिष्यों के साथ भ्रमण पर निकले. चलते-चलते रास्ते में उन्हें एक चट्टान दिखाई पड़ी. एक शिष्य ने कहा,' मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस चट्टान से बड़ा इस संसार में कुछ और नही हैं.' तब दूसरे शिष्य ने कहा,' पर मुझे ऐसा लगता है कि लोहा इस चट्टान से ज्यादा बड़ा है क्योंकि वह इसे काटने की शक्ति रखता है.' तीसरे शिष्य ने कहने में देर नही की ,' मित्रों, अग्नि तो लोहे से भी बड़ी हुई ना क्योंकि वह तो इसे गला देती है.' चौथा शिष्य भला कहां चुप रहने वाला था उसने तपाक से कहा,' पर अग्नि भी कहां सबसे बड़ी है, पानी तो उसका अस्तित्व ही मिटा देती है तो सबसे बड़ी तो पानी हुई ना.' पांचवां शिष्य भी बोल ही पड़ा,' पानी से बड़ी तो हवा हुई ना वह तो उसे सुखा देती है.' सभी शिष्य ...
एक थी फुलकुमारी
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एक थी फुलकुमारी...मां थी मेरी...अब नही है लेकिन मां तो मेरी अब भी वही है और जितनी बार मेरा जन्म होगा वही होगी...शायद इसीलिए तो मां हमसे पहले चली गई क्योंकि उन्हें भी हर जन्म में हमारी मां जो बनना था। मां का मस्त-मौला स्वभाव हमारे बीच नही है लेकिन वो तस्वीरें आंखों में कमल के फूल की भांति लगातार तैर रही है बिना रूके। पहले के जमाने में यादें आंखों में बसती थी पर अब तस्वीरें-विडियों आदि उन्हें हमसे दूर होने के अहसास को पल भर के लिए भूला देते हैं। इस ब्लॉग के जरिए माई की बातों को, यादों को सबसे साझा करूंगी। मां के बहाने अपने आपको अपनी बातों को एक नाम दूंगी, प्रत्येक बार एक नया नाम, नया शीर्षक। साहित्य, कहानी, फिल्म, टी.वी, लेख, बात-विचार दुनिया जहान की ढेर सारी बातें। मां मुझमे है और हमेशा रहेगी जीवित...मैं कुछ घंटो को छोड़ दूं तो बाकी सारे घंटे मां साथ-साथ रहती है। 12 अप्रैल को 4 महीने हो जायेंगे इस दुनिया से मां को गये हुए लेकिन यादें जिस तरह सशरीर मेरे दिलो-दिमाग में मौजूद है मुझे नही लगता वो कभी मुझसे दूर जा पायेंगी। इसलिए अब चलूंगी-बढूंगी लेकिन...